Just another WordPress.com site

Swar Vigyan

स्वरोदय विज्ञान

मानव सभ्यता के विकास के साथ-साथ ज्ञान-विज्ञान की अनेक शाखाओं, प्रशाखाओं का जन्म हुआ एवं समय के प्रवाह ने उनके परिणामों के आधार पर उनमें अनेक संशोधन एवं परिवर्ध्दन को रूपायित किया। प्रकृति ने इस अखिल ब्रहमाण्ड में अनंत वैज्ञानिक प्रणालियाँ दे रखी हैं। हम एक वैज्ञानिक प्रणाली की खोज करते हैं तो उसके अन्दर अनेक वैज्ञानिक प्रणालियाँ कार्यरत दिखती हैं। यदि हम सहज चित्त से उन्हें देखते हैं तो वे हमें विस्मय और आनन्द से रोमांचित कर देती हैं और यहीं से योग की भूमि तैयार होती है। शिवसूत्र में भगवान शिव ने इसीलिए विस्मय को योग की भूमिका कहा है – ‘विस्मयों योग भूमिका’। यहीं से सूक्ष्म-जगत से जुड़े प्रकृति प्रदत्त विज्ञान से मानव का परिचय होता है। इस क्षेत्र में भी अनन्त वैज्ञानिक प्रणालियाँ हैं और इन पर अनेक प्रामाणिक ग्रंथ उपलब्ध हैं। इन्हीं वैज्ञानिक प्रणालियों में एक स्वरोदय विज्ञान भी हैं।

जिस स्वरोदय विज्ञान की हम यहाँ चर्चा करने जा रहे हैं उसका सम्बन्ध मानव के श्वास-प्रश्वास से है। यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि स्वरोदय विज्ञान और प्राणायाम दोनों एक नहीं हैं। स्वरोदय विज्ञान हमारे शरीर में निहित श्वास-प्रश्वास की व्याख्या करता है, जबकि प्राणायाम श्वास-प्रश्वास का व्यायाम है। हालाँकि दोनों का साधक उन सभी आध्यात्मिक विभूतियों का स्वामी बनता है जिनका उल्लेख ग्रंथों में मिलता है।

स्वरोदय विज्ञान एक अत्यन्त प्राचीन एवं गुहय विज्ञान है। तत्व-मीमांसा(Metaphysics) की अनेक शाखाओं-प्रशाखाओं की जितनी खुलकर चर्चा सामान्यतया हुई है, उतनी स्वरोदय की नहीं हुई है। जबकि इसका अभ्यास सामान्य व्यक्ति के लिए काफी लाभदायक है। एक ज्योतिषी के लिए तो इसका ज्ञान अत्यन्त आवश्यक माना गया है। शिव स्वरोदय तो यहाँ तक कहता है कि स्वरोदय विज्ञान से रहित ज्योतिषी की वही दशा होती है जैसे बिना स्वामी के घर, शास्त्र विहीन मुख और सिर के बिना शरीर की। शिव स्वरोदय इस विज्ञान को अत्यन्त गोपनीय बताता है :

गुह्याद् गुह्यतरं सारमुपकार-प्रकाशनम्।

इदं स्वरोदयं ज्ञानं ज्ञानानां मस्तके मणि॥

(अर्थात् यह स्वरोदय ज्ञान गोपनीय से भी गोपनीय है। इसके ज्ञाता को सभी लाभ मिलते हैं। यह विभिन्न विद्याओं (गुह्य) के मस्तक पर मणि के तुल्य है।)

शायद इसीलिए अन्य गुह्य विद्याओं की तरह यह विद्या जन-सामान्य में प्रचलित नहीं हुई, जबकि सामान्य व्यक्तियों के उपयोग में आने वाली अत्यन्त लाभदायक बातों की चर्चा भी इसके अन्तर्गत की गई है।

स्वरोदय विज्ञान पर अत्यन्त प्रसिध्द ग्रंथ शिव स्वरोदय है। इसके अतिरिक्त परिव्राजकाचार्य परमहंस स्वामी निगमानन्द सरस्वती जी ने अपने ग्रंथ ‘योगी गुरु’ में पवन विजय स्वरोदय नामक एक ग्रंथ का उल्लेख किया है। स्वामी राम ने अपनी पुस्तक Path of Fire and Light, vol.I में एक और ग्रंथ ‘स्वर विवरण’ की चर्चा की है। बिहार योग विद्यालय, मुंगेर के संस्थापक एवं प्रसिध्द स्वरोदय वैज्ञानिक (साधक) स्वामी सत्यानन्द सरस्वती ने अपने ‘स्वर योग’ नामक ग्रंथ में इस विषय पर अत्यन्त विशद चर्चा की है। साथ ही, उन्होंने अपने इस ग्रंथ में शिव स्वरोदय का मूल पाठ भी हिन्दी अनुवाद के साथ प्रकाशित किया है। स्वामी जी ने इस विज्ञान पर तमिल भाषा में लिखित स्वर चिन्तामणि नामक ग्रंथ का उल्लेख किया है

स्वरोदय विज्ञान के अंतर्गत यहाँ मुख्य रूप से वायु, नाड़ी, तत्व, सूक्ष्म स्वर प्रणाली, इनके परस्पर सम्बन्ध, आवश्यकता के अनुसार स्वर बदलने की विधि तथा विभिन्न कार्यों के लिए स्वरों एवं तत्वों का चुनाव आदि की चर्चा की जाएगी। इसके अतिरिक्त, यहाँ स्वर के माध्यम से अपने स्वास्थ्य का ज्ञान प्राप्त करना एवं स्वर के माध्यम से विभिन्न रोगों के उपचार पर भी प्रकाश डाला जायेगा।

जीवनी शक्ति श्वास में अपने को अभिव्यक्त करती है। श्वास के द्वारा हीप्राणशक्ति (जीवनीशक्ति) को प्रभावित किया जा सकता है। इसलिए प्राण शब्द प्राय: श्वास के लिए प्रयुक्त होता है और इसे कभी प्राण वायु भी कहा जाता हैं। हमारे शरीर में 49 वायु की स्थितियाँ बतायी जाती है। इनमें से दस हमारी मानसिक और शारीरिक गतिविधियों को संचालित करती हैं। यौगिक दृष्टि से इनमें पाँच सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं:- प्राण, अपान, समान, व्यान ओर उदान।

प्राण वायु का कार्यक्षेत्र कण्ठ से हृदय-मूल तक माना गया है और इसका निवास हृदय में। इसकी ऊर्जा की गति ऊपर की ओर है। श्वास अन्दर लेना, निगलना, यहाँ तक कि मुँह का खुलना प्राण वायु की शक्ति से ही होता है। इसके अतिरिक्त, ऑंख, कान, नाक और जिह्वा ज्ञानेन्द्रियों द्वारा तन्मात्राओं को ग्रहण करने की प्रक्रिया में भी इसी वायु का हाथ होता हैं। साथ ही यह हमारे शरीर के तापमान को नियंत्रित करती है तथा मानसिक क्रिया जैसे सूचना लेना, उसे आत्मसात करना और उसमें तारतम्य स्थापित करने का कार्य भी सम्पादित करती है।

 

अपान वायु का प्रवाह नाभि से नीचे की ओर होता है और वस्ति इसका निवास स्थल है। शरीर की उत्सर्जन क्रियाएँ इसी शक्ति से संचालित होती हैं। इस प्रकार यह वृक्क, ऑंतें, वस्ति (गुदा), मूत्राशय एवं जननेन्द्रियों की क्रियाओं को संचालित करती है। अपान वायु में व्यतिक्रम होने से मनुष्य में प्रेरणा का अभाव होता है और वह आलस्य, सुस्ती, भारीपन एवं किंकर्तव्यविमूढ़ता से ग्रस्त हो जाता है।

समान वायु हृदय और नाभि के मध्य सक्रिय रहती है और चयापचय गतिविधियों (Metabolic Activities) का नियमन करती है। कहा जाता है कि मुक्ति का कारक भी यही प्राण है। इसका निवास स्थान नाभि और ऑंतें हैं। यह अग्न्याशय, यकृत और अमाशय के कार्य को प्रभावित करती है। इसके अतिरिक्त यह हमारे भोजन का पाचन करती है और पोषक तत्वों को अपशिष्ट पदार्थों से विलग भी करती है। इसकी अनियमितता से अच्छी भूख लगने और पर्याप्त खाना खाने के बाद भी खाए हुए भोजन का परिपाक समुचित रूप से नहीं होता है और चयापचय गतिविधियों के कारण उत्पन्न विष शरीर में ही घर करने लगता है, जिससे व्यक्ति अम्ल दोष का शिकार हो जाता है। जब यह प्राण संतुलित होता है तो हमारी विवेक बुध्दि सक्रिय रहती है और इसके असंतुलन से मानसिक भ्रांति और संशय उत्पन्न होते हैं।

 

उदान वायु प्राण वायु को फेफड़ों से बाहर निकालने का कार्य करती है। इसका निवास स्थान कंठ है और यह कंठ से ऊपर वाले भाग में गतिशील रहती है। यह नियमित होने पर हमारी वाक्क्षमता को सशक्त बनाती है और इसकी अनियमितता स्वर-तंत्र और श्वसन तंत्र की बीमारियों को जन्म देती है। साथ ही इसमें दोष उत्पन्न होने से मिचली भी आती है। सामान्य अवस्था में उदान वायु प्राण वायु को समान वायु से पृथक कर व्यान वायु से संगम कराने का कार्य करती है।

व्यान वायु का जन्म प्राण, अपान, समान और उदान के संयोग से होता है। किन्तु व्यान के अभाव में अन्य चार वायु का अस्तित्व असंभव है, अर्थात् सभी प्राण एक दूसरे पर आश्रित हैं। व्यान वायु हमारे शरीर का संयोजक है। प्राण वायु को पूरे शरीर में व्याप्त करना, पोषक तत्वों का आवश्यकतानुसार वितरण, जीवन ऊर्जा का नियमन, शरीर के विभिन्न अंगों को स्वस्थ रखना, उनके विघटन पर अंकुश लगाना आदि इसके कार्य हैं। यह पूरे शरीर में समान रूप से सक्रिय रहती है। पूरे शरीर में इसका निवास है। ज्ञानेन्द्रियों की ग्राहक क्षमता का नियामक व्यान वायु ही है। सभी ऐच्छिक एवं अनैच्छिक शारीरिक कार्यों का संचालन व्यान वायु ही करती हैं। हमारे शरीर का पर्यावरण के साथ संवाद या पर्यावरण के प्रति हमारी शारीरिक प्रतिक्रियाएं इसी वायु (प्राण) के कारण होती है।

 

 


Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

Follow

Get every new post delivered to your Inbox.